ग़ज़ल

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती पर विशेष



मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती पर विशेष


अमर कथाशिल्पी व उपन्यास सम्राट मुंशी  प्रेमचंद जी की 133वीं जयंती आ रही है  ऐसे समय में अमरकथा शिल्पी के विचारों की प्रांसगिकता व महत्ता और   अधिक  बढती जा  रही   है|  उस समय  किसानों व मजदूरोंकी स्थिति के बारे में समाज की दशा व दिशा देने का कार्य तत्कालीन साहित्यकारों ने पूरी ईमानदारी से निर्वहन किया लेकिन आज देश का युवावर्ग अपने दायित्वों से भटक गया जिसके कन्धों पर देश की रक्षा ,विकास अन्य क्षेत्रों में महती जिम्मेदारी है क्या आज देश का साहित्यकार वर्ग व शिक्षितवर्ग अपने उत्तरदायित्व को ईमानदारी से निभा रहे है |युवाओं को दायित्वबोध करा रहे है यह एक विकराल व विचारणीय यक्ष प्रश्न है |
आज जब इस प्रश्न का उत्तर खोज रहा हूँ व चिंतन मनन कर रहा हूँ तो काफी हताशा महसूस होती है . आज हर कोई अपने आप में मगन है . किसी देश व समाज दिशा व दशा की चिंता नहीं है और न ही युवावर्ग के नैतिक व चारित्रिक पतन के कारणों को जानने व रोकने के लिए कोई सोंच है| मेरे मन में सदैव एक सवाल उठता था| मैं जब जब मुंशीप्रेमचंदजी जीवन परिचय को पढता था मुझे हमैशा यह लगता था की मुंशीजी इन कहानियों में ऐसा क्या लिखा है जिसके चलते मुंशी प्रेमचंद जी को नवाब राय से मुंशी प्रेमचंद के नाम से लेखन शुरू करना पड़ा | मुंशी प्रेमचंद जी ने आज से १०२ वर्ष पूर्व नवाबराय के नाम से उर्दू पत्रिका ' जमाना 'में 'सोजे वतन ' याने देश का दर्द 'नामसे पांच कहानियों का संग्रह निकला था जिसके चलते तत्कालीन अंग्रेज सरकार की चूलें हिल गई थी खुफिया तंत्र नवाबराय की खोज में लग गई सोजे वतन में सबसे छोटी कहानी का शीर्षक 'दुनिया का सबसे अनमोल रतन ', 'शेख मखमूर ',' यंही मेरा वतन 'सोक  का पुरस्कार '',' सांसारिक प्रेम और देशप्रेम था इनपांच कहानियों में ऐसा क्या था जिसने अंग्रेज सरकार को हिलाकर रख दिया |
ख़ुफ़िया तंत्र नवाब राय की खोज करता रहा आख़िरकार नवाब राय सरकारी लाजिम थे पुलिस नवाब राय को खोज निकाला! दर्द की एक चीख की तरह ये कहानिया जब एक छोटे से किताब की शक्ल में आज से १०२ वर्ष पूर्व निकली वह ज़माना और था आजादी की बात भी उन दिनों हाकिम का मुंह देखकर कहने का रिवाज थी| कुछ लोग इस रिवाज को नहीं मानते है मुंशी प्रेमचंद उन सिरफिरों में से एक थे| 
सोजे वतन की रचना सरकारी नौकरी करते हुए मुंशी प्रेमचंद जी ने नवाबराय के नाम से लिखी थी ख़ुफ़िया पुलिस ने सुराग लगा लिया की नवाबराय कौन है हमीरपुर के कलेक्टर ने मुंशी जी क फ़ौरन बुलाया मुंशीजी बैलगाड़ी से रातो रात हमीरपुर के कुलपहाड़ तहसील पहुंचे उन दिनों कलेक्टर साहब का निवास था कलेक्टर बहुत गरजे और कहा की खैर मनाओ की अंग्रेजी अमलीदारीमें हो , सल्तनत मुगलिया का जमाना नही वरना तुम्हारे हाथ काट लिए जाते |तुम बगावत फैला रहे हो| सोजे वतन की सारी कापियां मंगाई गई  और आग के हवाले कर दी गई |
मुंशीजीके इरादें में हल्की भी आंच नहीं आई यह नाम न सही  हाँ दुःख जरुर होता है बड़ी मेहनत से आठ दस बरस सेवा पोसा एस नाम को लेकिन खैर शायद यही तक साथ था इस नाम  का |और तब प्रेमचंद का जन्म हुआ | मुंशी प्रेमचंद के सोजे वतन में वास्तव में देश का दर्द व् देशभक्ति दिखाई देती है  सोजे वतन कहानी संग्रह की पहली कहानी ' दुनिया का सबसे अनमोल रतन ' शीर्षक से प्रकाशित है|
इस कहानीमें दिलफिगार की कहानी है जिसमे उसकी प्रेमिका दिलफरेब के द्वारा दुनिया की सबसे अनमोल रतन लानेको कहती है सबसे पहले दिलफिगार कालू चोर जिसे सूली की सजा दी जा रही थी उसके आंसू को लाया दूसरी बार सती हुई नारी की राखको लेकर दिलफरेब के पास पहुंचा अंतिम बार भारतमाता की रक्षा में प्राण गंवाते राजपूत सैनिक के खून की बूंद लेकर दिलफिगार अपनी प्रेमिका के पास पहुंचा| और सारा वाकया सुनाया दिलफरेब ने वीर सैनिक जिसने देश रक्षा में अपना लहू दिया उसे ही दुनिया का सबसे अनमोल रतन के रूप में स्वीकार किया | वैसे ही एक कहानी 'यही मेरा वतन 'एक भारतीय अमेरिका में बहुत धन कमाया आखिरी समय अपने वतन में प्राण त्यागे ,इस उद्देश्य से अपने परिवार को अमेरिका में छोड़कर ९० वर्ष की उम्र में भारत आता है भारत में परिवर्तन देखता है उसके मन में हताशा आती है लेकिन सुबह गंगा नहाते जाते लोग व् अन्य चीजो को देखकर है कहता है यही मेरा वतन है और अंतिम समय तक गंगा किनारे कुटिया बनाकर रहता है |
इस तरह देश के दर्द को पिरोया मुंशी प्रेमचंदजी ने अपनी कहानियों में लेकिन आज किसी को भी चिंता नहीं है देश के दर्द की | आज हमें इसके लिए चिंतन-मनन करने की अति आवश्यकता है | मुंशीजी के अंतिम समय के बारे में बनारसीदास चतुर्वेदी जी ने लिखते है की ०८-अक्टूबर १९३६ को मुंशीजी का निधन हुआ उनकी शवयात्रा में काफी कम लोग शामिल थे उनकी शवयात्रा को देखकर किस ने पूछा -कै रहल ?, क्या हुआ ?-उनका जवाब था कोई मास्टर था | यह है हमारी सोच ?

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