ग़ज़ल

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

नारों की गूंज

 



     नारों की गूंज
नारों की गूंज से गूंजता आकाश है |       
क्या किया  है तुमने ये कैसा विकास है |
किये थे वादे तुमने लोगो से  बडचढ़कर, 
फिर  भला क्यूँ उनका टूटता विश्वास  है |              
अंधकार और गहन  होता ही जा रहा ,
न जाने किस कोने में दुबका प्रकाश है |
पुलिस तो होती रही रोज ही बदनाम ,
क्योंकि थाने के आस- पास मिल रही लाश है |
राहत के काम से जनता बेहद आहत है,
क्युंकी हिस्से की बात  में ठेकेदारों में टास है |    
नारों की गूंज से गूंजता आकाश है |       
क्या किया है तुमने ये कैसा विकास है 
                                                                                         
शंकर गोयल,पिथोरा 
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